क्या बचा है अब गँवाने के लिए
क्या बचा है अब गँवाने के लिए
शाम ढल रही है निभाने के लिए
हाले दिल किस-किस को बतायें
हँसते हैं सुरते-हाल छिपाने के लिए
दर्द के भगोने मे भरकर अश्क
पी लेते हैं ज़िंदगी बचाने के लिए
कभी थी मदहोश हवाएँ भी साथ
अब करीब नहीं दिखाने के लिए
पहाड़ों ने छोड़ा पकड़ चट्टानों से
वो निकल पड़े हमे मिटाने के लिए
गुनेश्वर
No comments:
Post a Comment