मैं दर्द अपना दबा के ले आया
आज खुल कर जीने मे मजा आया
वो देते रहे जख्म–दर–जख्म
आँखों मे मैं अपने दर्द सजा आया
तानो मे नहीं जिया जाता मुझसे
ये राज आज मैं तो उन्हे बता आया
रहना चाहा मुहब्बत मे हमेशा
पर बेरुखी से प्यार मैं बुझा आया
इंसानियत भी रही मेरी बेमोल
खुद को तसल्ली से उलझा आया
गुनेश्वर
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