मुझ पर एहसानों का मुल्लाम्मा चढ़ा रहा है
सरे बाज़ार वो एहसान फरामोश बता रहा है
हर वक्त मेरा भी उसकी यादों मे बीतता है
शायर है वो, पर खुद को दरवेश बता रहा है
इस तरह अपनी यादों मे अजनबी हो गया हूँ
मेरे सोच को पूर्वाग्रह मे समावेश बता रहा है
एहसान फरामोशी का किरदार चस्पा कर रखा
मेरे अंदर के आवेग को, वो आवेश बता रहा है
मित्र मैं दक़ियानूसी सलाखों से भेदा नहीं करता
रुसवाइयाँ करता, उँगलियों से खामोश बता रहा है
गुनेश्वर
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