साँझ की धड़कन से आज शब्द का श्रिंगार कर लूँ
धूप की स्याही से ईक गज़ल तैयार कर लूँ
खूबसूरती का समन्दर गंगा की मानिंद है
हिमाच्छादित ओढनी सा आज व्यवहार कर लूँ
गगन की शागिर्दी मे भी ज़िंदगी का जुनूँ देख
शीला को मूर्ति बना मैं उससे प्यार कर लूँ
होलिका की राख़ लगाते हम सामाजिक सारे
प्रहल्लाद की छुवन पर आज एतबार कर लूँ
क्या कुत्सित रहा दुर्योधन का ही चेतन मन?
या भीष्म के भीष्म प्रीतिज्ञा पर प्रहार कर लूँ
द्रोपदी का चीरहरण किन पापों का प्रायश्चित
महाभारत के पात्रों का क्यूँ न संहार कर लूँ
बेटियाँ संघर्ष कर रही आज प्रेम का पतन देख
भ्रूण मिटाने वालों का क्यूँ न प्रतीकार कर लूँ
गुनेश्वर
काष्ट पर शब्द का श्रींगार अलग होता है
मूर्ति बनकर उभरती है प्यार अलग होता है
सभा की गरिमा का व्याख्यान निराला है
समन्दर है खाली प्यासा हाला है
धड़कन नाचती रहे शब्दों के ताल पर
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