शेरों को कुछ हट के कहना चाहतें हैं
न जाने क्यों छट के रहना चाहतें हैं
कहतें हैं तजुर्बा है मुहब्बत का बहुत
फिर क्यों वो बट के रहना चाहतें है
नव-प्रवाह की भावनाओं का मोल नहीं
अपने परिवेश मे डट के रहना चाहतें है
वाह का निबाह भी अदभूत पहेली है
अपनी पोस्टों से सट के रहना चाहते हैं
मेरी ढपली मेरा राग और मेरा ही प्रसाद
चेतन सारे जाने क्यों कट के रहना चाहते हैं
गुनेश्वर
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