छलावा है ढोंग है पाखंड है
वजूद इंसान का खंड-खंड है
हैं मेहनतकश सारे ही यहाँ
पर रोटी का सवाल प्रचंड है
सदमों का इतिहास आँखों मे
वजूद यहाँ निर्जीव नरमुंड है
नहीं मरता है रक्तबीज कोई
परिपालक ही बड़ा उदण्ड है
गुम हैं बेटी शातिरी चाल मे
माँ को दिया क्यों यह दंड है
वृद्ध से मांगते हैं अब साक्ष्य
सभ्यता का फर्ज खंडखण्ड है
मौलिकता है अब लुप्तप्राय
सब को यहाँ क्यूँ घमंड है|||
गुनेश्वर
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