मेरे शब्दों की पगडंडियों पर चल के आ
मैं अलग हूँ मुझ तक जरा संभल के आ
[प्रथम दो पंक्तियाँ मधु कवि की महफिल]
मौन हूँ मैं मनन का साहित्य दे रहा हूँ
आ जरा जल्दी जल्दी तू मचल के आ
नेह की धरा पर सात्विक्ता का कीर्तन हूँ
न तू अब इस तरह बिचल-बिचल के आ
खौफ का नहीं है संगीत, न मैं दे रहा हूँ
लालित्य का गीत हूँ तू बस चल के आ
तू भी समझ ले कोख का कलरव अब तो
न ले मातृत्व की आह, जरा संभल के आ
गुनेश्वर
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