नित्य नई सोच का मैं सिद्धान्त कैसे पालूँ
मौन हो चुके निर्वाह का व्यख्यान कैसे पालूँ
कन्दराओं मे जा रहूँ मैं भी गर्वित मन से
संसारिक सभ्यता का मैं आख्यान कैसे पालूँ
गौर करता रहा मैं सौंदर्य के लालित्य पर
लालित्य के सोहार्द मे, मैं जान कैसे पालूँ
महिमायुक्त शब्द सेतु भी टूट रहे शने:शने”
शब्दों मे सत्विक्ता का तो ज्ञान कैसे पालूँ
कुबड़ी हो रही है मौलिकता की सार्थकता
उस सार्थक्ता का मैं अभीमान कैसे पालूँ
विभूषित हो रहा असभ्यता का संस्कार अब
सौतिहा-डाह के कराह मे, मैं प्राण कैसे पालूँ
हिन्दी को शौक का साहित्य परसोता पार्थ
उत्कृष्टता के प्रवाह का मैं शान कैसे पालूँ
गुनेश्वर
सौतिहा-डाह = विदेशी असभ्य संस्कृति जिसे
हम अपनाते जा रहे हैं||
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