गाँव की दूरी है अब खत्म,शहर-शहर जुडने लगा
हर रास्ता शहर का तो,गाँव की तरफ मुड़ने लगा
कुचली जा रही है संस्कृति, अब तो गाँव की भी
क्या करे वह बुजुर्ग, परवश परिवेश से कुढ़ने लगा
पुराना बरगद का वह शजर, कट कर गिरने लगा
सड़क चौड़ीकरण मे गाँव का भोलापन, उजड़ने लगा
मोटर कारों का शोरगुल, इतना बढ़ गया की
बछड़ा रंभाने के लिए भी, अब सिहरने लगा
लंबी लंबी साड़ियाँ सुखाई जाती थी,गांवों मे कभी
अर्धनग्न कपड़ों का प्रचलन, वहाँ भी बढ्ने लगा
चौपालों की व्यवस्था, जो थी कभी निराली
वह व्यवस्था ही लोगों को, अब खलने लगा
बुजुर्गों से सलाह लेने की, जो थी परिपाटी
इस तरह का व्यवाहर तो वहाँ, टलने लगा
खेतो का पैमाना कम-से-कमतर होने लगा
मकानो का बहूराष्ट्रीयकरण वहाँ बढ्ने लगा
बिखर गई स-हृदय मानसिकता मेरे गाँव की
मेरा प्यारा वो गाँव शहर-की तरह जलने लगा
गुनेश्वर
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