Monday, 22 July 2013

तुम डिबरूगढ़ की शहजादी
मैं कुम्भ मे बिछुड़ा आवारा

तुम पानी की लगती फुहारें
मैं समन्दर का झाग खारा

तुम हो चन्दन की खुशबू
मैं मुनिसपालिटी का बेचारा

तुम वीणा की झंकृत वाणी
मैं झींगुरों सा कीर्तन प्यारा

तुम हो गंगा की नैसर्गिक्ता
मैं उथला नलकूप हूँ हारा

तुम लगती गीता की सौगंध
मैं अपनी कविता मे बंजारा

तुम शीतल शब्दों की गरीमा
पर मित्र मुझे पुकारे दोबारा
गुनेश्वर

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