अपनत्व का तुम एहसास दिलाया करो
इन गलियों मे भी कभी तो आया करो
ढूँढने की तपिश तो बाकी है यारों
हमसे भी तो कभी हाँथ मिलाया करो
निगाहों मे मस्तियाँ और वो बाँकपन
कभी कभी ही सही, हमे सहलाया करो
रुसवाइयों का शहर तन्हाइयों का शजर
इन बातों से न तुम यूँ भरमाया करो
पता है रूह तक उतर जाऊँगा यकबयक
हमारे इस यकीं को तो निभाया करो
गुनेश्वर
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