गुमनामियों की भीड़ मे मुझे
तन्हाइयों का असर दे दो
जी लूँ मैं भी गमों मे अब
कोई कठिन ऐसा सफर दे दो
काँटों सी रवायते हैं जीवन की
खुरदुरी सी उनकी नजर दे दो
चस्पा कर सकूँ मुकद्दर अपना
कोई काँटों भरा शजर दे दो
जख्म नासूर बन गया है अब
हमारी लंबाई की कबर दे दो
गुनेश्वर
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