वो सबको रास्ते पर पड़ा पत्थर समझता है
गुरूर देखो कहता है वो किस्मत बदलता है
जुडते हैं सब मुहब्बत के साथ उस शख्स से
यकीं करता है पर खुद की सोच पर चलता है
दीवारों पर चस्पा करता है रंग बिरंगी तस्वीरे
नियमों की आड़ मे वो चाँदनी से भी जलता है
गुनाह न मेरा था , गुनाह न कभी उनका रहा
पर संकीर्ण सोच की परिधि से,नहीं निकलता है
मित्र गर मुझमे गुरूर है तो आ मुझे समझा ले
इस बात पर भी तो वो कभी नहीं मचलता है
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