नेह की धरा में आज सपनों के घरौंदे हैं
इन्हें चाहने वाले भी तो कितने सौंधे हैं
मिट्टी हाँथों मे लेकर मैं मंत्र पुष्प पढ़ता हूँ
आस्था तो चरमौतकर्ष,मगर मनन औंधें हैं|||
किण्वन की हमको नहीं आती प्रक्रिया समझो
हमने भी लगाए धरा पर कितने पौधें हैं|||
जिज्ञासुल है अब अंतस की संकीर्णता
जाने क्यूँ इस तरह के विचार कौंधे हैं|||
क्या ही ! खूब श्रिंगारित है, धरणी का सौंदर्य
पर बेदर्दी से, धरा को अपने, क्यों?रौंदें हैं|||
झूठ को जो बालिस्त भर जमी भी दे दोगे तुम
सौन्दर्य सच का वजूद कुरेदेगा चौखट पर
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