ज़िंदगी यूं ही चलता जा रहा है
मन तो बस जलता ही जा रहा है
मौन हो गई एहसासों की गर्मी
सूरज भी अब ढलता ही जा रहा है
शब्द कभी अमृत सा लगता था
जाने क्यूँ खलता ही जा रहा है
क्रोध इतना बढ़ गया मन का
आग मे पिघलता ही जा रहा है
मुहब्बत अंजुरी भर भर थी कभी
अब बस हाँथ मलता ही जा रह है
वो बच्चा पैदा हुआ सड़कों पर
बेहिचक वहीं पलता ही जा रहा है
मक्कारों की इस भरी दुनिया मे
देह से देह मसलता ही जा रहा है
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