मैं जब भी उदास होता हूँ
पसीने को अपने चाट लेता हूँ
नमकीन सी महक होती है
मैं उदासी उसमे बाँट लेता हूँ
करतबी है दुनिया जुगाड़ मे
मैं पसीने की रोटी गाँठ लेता हूँ
थक कर जो चूर हो जाऊँ मैं
मेहनत की रोटी काट लेता हूँ
भूख गर न सही जाये मुझसे
खुद ही खुद को डांट लेता हूँ
गुनेश्वर
जब उदास होता हूँ पसीना चाट लेता हूँ
नमकीन सी महक से उदासी बाँट लेता हूँ
मेरे शब्दों को अर्ज का तुम इक दुपट्टा देना
गुमराही के वो सारे पट मैं बंद कर लूँगा
गुनेश्वर
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