वक्त के बिस्तर से, तू सलवटों की चादर हटा दे
एक बच्चा चाहता है सोना, उसे सुकून से सुला दे
नहीं है हमारी ज़िंदगी मे संगीत का कोई दुपट्टा
बचपन को सुकून का छाँव दे , गमो से हटा दे
मृगमरीचिका है, ज़िंदगी मे, कोई अनोखा तोहफा
याद कर,मनन के ममत्व को, आज नई दिशा दे
बिवाइयाँ पड़ गई हैं तप्त रेत मे नंगे पाँव रहते
अपने आँसुओं से ठंडक के उस एहसास को हवा दे
बहल जाएगा आज अपने बच्चे का भी कोमल मन
“”बस होठों की पथरीली सतह से जी भर मुस्कुरा दे””
गुनेश्वर
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