अपने खुशियों का इंतजाम कर आया हूँ
आज मुहब्बत उसके नाम कर आया हूँ
अब न वो खाली है न हम खाली रहेंगे
मुहब्बत उसके भी सिने मे भर आया हूँ
बड़ी मुद्दत हुई दिल खोल कर बोले हुए
आज अपने ही सौदे से मैं तर आया हूँ
कभी सजदे मे भी न झुका ये सर मेरा
उनके लिए मैं “मैं” की सीढ़ी उतर आया हूँ
क्या ही उम्दा सी हक़ीक़त ले कर मित्र
आज मैं कितनों बरसो बाद घर आया हूँ
गुनेश्वर
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