आ तुझे स्नेह की धरा पर सोच का सिद्धान्त दूँ
उंगली ना उठा सके इस तरह का ईमान दूँ
जो उकेरी जाएँगी तस्वीरे मौसम के मिजाज की
उस मिजाजे-मौसम को तिरी मुहब्बत का नाम दूँ
न डर, खोने न दूंगा, वजूद तेरा हकीकत के सागर मे
ये सृष्टि का समूह तुझ सा बना रहे उन्हे ये काम दूँ
खूबसूरत शब्दों की मर्यादा का बेखौफ इंतजाम कर
इंसानियत-ए हकीकत का तेरी लोगों को पैगाम दूँ
तीज त्योहार मे सभ्यता से सांस्कृतिक गले मिल
जीवन सार्थक हो ऐसा ही कोई मंत्र नजरे-आम दूँ
गुनेश्वर
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