हमारा आना जाना न हुआ तो क्या हुआ
मुहब्बत दिखाना न हुआ तो क्या हुआ
हमारी भी मुहब्बत को न समझा कोई
हमसे मनाना न हुआ तो क्या हुआ
कब समझा अपना, और ये तल्खियाँ
पर हमसे सताना न हुआ तो क्या हुआ
कई शामे तेरी महफिल मे गुजारी थी
हर बार आना न हुआ तो क्या हुआ
साँप आस्तीन मे छुपा कर नहीं रखते
गमों का बहाना न हुआ तो क्या हुआ
रूठ कर दिल ही निकाल लेते हैं अक्सर
खुद को और भरमाना न हुआ तो क्या हुआ
न कोई गम इधर है न कोई गम उधर है
प्यार फिर जताना न हुआ तो क्या हुआ
नफ़रतों को शहद बना पिलाया हमे तुमने
पर गैर तुम्हें कहना न हुआ तो क्या हुआ
राह चलते मुलाक़ात हो, दुआ सलाम कर लेंगे
ताउम्र मित्रता निभाना न हुआ तो क्या हुआ
गुनेश्वर
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