स्सी जल गयी मगर बल नहीं गया.
आस्तीन के सांप तेरा छल नहीं गया..
टूटी खाट,निवाड़ ढीला,कसा नहीं गया
जो बुजुर्ग जिन्दगी से, टल नहीं गया
चप्पल मे पिन लगाए कहाँ नहीं गया
हाँथ फैलाए जो जिस्म जल नहीं गया
लाख सहे ताने पर वो घर से नहीं गया
जब तक हाँथों मे पोता पल नहीं गया
हमसे उनका प्यार निभाया नहीं गया
हमारे अंतस का शैतानी खल नहीं गया
गुनेश्वर
No comments:
Post a Comment