ऐसी भी क्या मजबूरी हुई
की हमसे इस तरह दूरी हुई
निगाहे पाक लिए हुए थे
फिर क्या ये बात अधूरी हुई
रूठने की फितरत नहीं हमे
किए वादे क्या, नही पूरी हुई
अशकों का सैलाब न दो हमे
क्या ज़िंदगी की यही धुरी हुई
है कोई मन मे छिपी बात
शायद यही बात उनकी जरूरी हुई
Guneshwar
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