लिख कर नाम मिटाना उसकी आदत है
लिख कर नाम मिटाना उसकी आदत है
वो कातिल मुहब्बत से शर्मिंदा करती है
रोज हमसे ही काम का गुहार करती है
पर हमेशा वो सरे बाजार निंदा करती है
हाँथ थामा तो समझा तकदीर खुल गयी
जो मिली, रुला रुला के जिंदा करती है
एशों आराम सारे दिये जी भर भर के
पलंग तोड़ती, पूरा जीवन गंदा करती है
शाली से जरा क्या हँस बोल लिए कभी
मुहल्ले-मे सब के सामने पंगा करती है
बड़ी गुस्सेल है वो नकचढ़ी छप्पन छुरी
बेरहमी से मार मार के चंगा करती है
कासे कहें, कैसे कहें दुख भरी बातें मित्र
बात-बे-बात न जाने क्यों दंगा करती है
गुनेश्वर
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