सिखाता चला गया
जो मैंने दर्द अपना जब भी निचोड़ा है
तू सूरज बनकर उसे सूखाता चला गया
उम्मीदों को न तुमने कभी डूबने दिया
पतवार बन मुझे निभाता चला गया
वक्त की सुलह मे काँटों को हटा दिया
मेरे वजूद मे तू ही समाता चला गया
हाँसिये पर रहा संघर्षों की राख भी रही
जज्बा-ए-हुनर तू सिखाता चला गया
सुदामा सी मुफ़लिसी रही वक्त-बेवक्त
कृष्ण बनकर तू मुझे रिझाता चला गया
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