चुप रह कर वो जीता है
चुप रह कर वो जीता है
वो जहर रोज पानी की तरह पीता है
ख्यालों को वो पिरोता है
पर अन्दर से वो खाली खाली रीता है
गमों की राहों मे घूमता है
अंजाने चेहरों मे रोज वो ही दिखता है
बिखर कर कहाँ सँवरता है
और बिखरने के लिए घर से निकलता है
मनुज आज नहीं निखरता है
इंसानियत इस बाजार मे रोज मरता है
गुनेश्वर
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