Wednesday, 24 July 2013
रो रो कर तो उसका बहुत बुरा हाल हो गया
सब कहते हैं शर्म से चेहरा लाल हो गया
आने का कह गए पिया,नही आ पाये सीमा से
खबर भी नहीं,न पत्र ही,ये कैसा हाल हो गया
आस लिए खुशी से रात भर न सोती थी बेचारी
रक्षक, न आए अबतलक,और दस साल हो गया
हम सब घरों मे अपने खुशियों मे मशगूल हैं
उसकी उन आँखों मे रो-रो कर जाल हो गया
अब तो कोई बता दे खाविंद जिंदा है या मुर्दा
सुख कर तो जिस्म उसका खाल हो गया
रफ्ता रफ्ता कट जाएगी यह ज़िंदगी भी उसकी
व्यवस्था देश की उसके लिए गर्तो-गाल हो गया
जो पता चला जिंदा है, अब तक खाविंद पड़ोस मे
द्वारे खड़ी राह तकते उसका इंतकाल हो गया
नेह की धरा में आज सपनों के घरौंदे हैं
इन्हें चाहने वाले भी तो कितने सौंधे हैं
मिट्टी हाँथों मे लेकर मैं मंत्र पुष्प पढ़ता हूँ
आस्था तो चरमौतकर्ष,मगर मनन औंधें हैं|||
किण्वन की हमको नहीं आती प्रक्रिया समझो
हमने भी लगाए धरा पर कितने पौधें हैं|||
जिज्ञासुल है अब अंतस की संकीर्णता
जाने क्यूँ इस तरह के विचार कौंधे हैं|||
क्या ही ! खूब श्रिंगारित है, धरणी का सौंदर्य
पर बेदर्दी से, धरा को अपने, क्यों?रौंदें हैं|||
झूठ को जो बालिस्त भर जमी भी दे दोगे तुम
सौन्दर्य सच का वजूद कुरेदेगा चौखट पर
ज़िंदगी यूं ही चलता जा रहा है
मन तो बस जलता ही जा रहा है
मौन हो गई एहसासों की गर्मी
सूरज भी अब ढलता ही जा रहा है
शब्द कभी अमृत सा लगता था
जाने क्यूँ खलता ही जा रहा है
क्रोध इतना बढ़ गया मन का
आग मे पिघलता ही जा रहा है
मुहब्बत अंजुरी भर भर थी कभी
अब बस हाँथ मलता ही जा रह है
वो बच्चा पैदा हुआ सड़कों पर
बेहिचक वहीं पलता ही जा रहा है
मक्कारों की इस भरी दुनिया मे
देह से देह मसलता ही जा रहा है
मैं उनके मुकाम तक जब आ जाऊँगा
वाह-वाह का दामन मैं भी निभा जाऊँगा
न कोई बैर न छल कपट मेरा उनसे
मेहनत मे हूँ,इक सीढ़ी तो पा जाऊँगा
वो मुझसे टूट के मिलते हैं हमेशा
उनके गजलों का दिया सजा जाऊँगा
लोग गुबार निकालते हैं गाहे बगाहे
वक्त आयेगा मैं सब को जता जाऊँगा
टूटता है हर बार सरगोशीयों के जहर से
सोचता है अब इश्क का राज बता जाऊँगा
शहर की गलियाँ अनजान रहने लगी है
आजकल वो बहुत परेशान रहने लगी हैं
बेरिकेट के साये मे जीती है ज़िंदगी
बटालियन को देख हैरान रहने लगी है
छिन गई है आजादी चप्पे चप्पे की
संकरी गली भी वीरान रहने लगी है
दर्द भी सुख चुका खुरचने की इंतेहा है
ज़िंदगी अब खुद मेहमान रहने लगी है
दर्द की कसीदाकारी मे है वो मादरजाद
चीख पुकार जैसे वरदान रहने लगी है
गुनेश्वर
गफलत की चाँदनी मे आज नहा तू लूँ
शौक को मेज के नीचे से मँगवा तो लूँ
ठेका ठूक गया है सामाजिक चेतना का
पेनशनी बूढ़े से अंटी मे कुछ डलाव तो लूँ
मुलाज़िम हूँ सरकारी, सत्ता जैसा ही हूँ
किसानो की भी मैं धोती उतरवा तो लूँ
घुसपेठिये सीमा पार से आतें हैं आने दो
वोट-बैंक है वो, नकली कार्ड छपवा तो लूँ
चाटुकारी की सत्ता है, साथ चुना-कत्था है
जो बचा है उसमे भी मैं चुना लगवा तो लूँ
गुनेश्वर
क्यों फिर से मुझे गमों ने घेरा है
प्यार ने क्या फिर से मुह फेरा है
बड़ी मुश्किलों से टूट कर जुड़ा हूँ
लगता है,जहाँ मे,नहीं कोई मेरा है
मिटाने की हद तक मिटाया गया
कहतें हैं, क्या बचा है,क्या तेरा है
खुल कर नही आया कोई सामने
हर दिन इंतजार मे,हुआ सवेरा है
सोचते रहे,डूब जाऊँगा,एकाकी मैं
अब तक ऐसा,नही कोई लुटेरा है
गुनेश्वर
आज कविता बिखर रही है
नहीं ये अब निखर रही है||
हर तरफ चर्चा ये आम है
इस की न अब फिकर रही है
मैं” की सीमाओं मे रुके सारे
सीखा दें कुछ न ज़िकर रही है
दिली जज़्बात ही तो कविता है
यही हर्फो मे आज उतर रही है
नव, कुछ सीख लें| चेतन, कुछ सीखा दें
न ये बात आज किसी पहर रही है
गुनेश्वर
नव : नए कवि
चेतन : परिपक्व / सुलझे हुए
हादसों ने बड़ी शिद्दत से संभाला है मुझे
हमेशा जिंदा रहूँ ऐसा ही ढाला है मुझे
कई-कई लम्हे तन्हाइयों ने घेरा है मुझे
मुक्कद्दस जज्बे ने हमेशा निकाला है मुझे
एहसासों को भींच लिया था मैं डरते डरते
मेरी अदा को कहते हैं मार डाला है मुझे
चाहा बहुत मैं अपनों मे अपना बन कर रहूँ
छु न जाये परछाईं मेरी, टाला है मुझे
जिस्मानी खूबसूरती की नहीं है चाह मुझे
बस उनकी दिलकश हँसी ने ही पाला है मुझे
गुनेश्वर
धर्म के पहरेदार बहुत हैं यहाँ
मिन्नतों के बाज़ार बहुत हैं यहाँ
कोख की मर्यादा,ताक पर रखते
ऐसे -ऐसे रिश्तेदार बहुत हैं यहाँ
कोख की भृकुटी तनने से पहले
वार करते इजज्तदार बहुत हैं यहाँ
निछावर कर देती अस्मत मित्रता मे
न मालूम था बहरूपिये यार बहुत हैं यहाँ
धमाको की राख़ चन्दन की तरह लगाते
ऐसे कमीने कमजर्फ गद्दार बहुत हैं यहाँ
दो और दो पाँच का वित्त बनाते,सीखाते
ऐसे ऐसे बेहतरीन चमत्कार बहुत हैं यहाँ
भभूत दे बाहों मे कैद के लिए लालायित
ऐसे भी तो पाखंडी मक्कार बहुत हैं यहाँ
गुनेश्वर
अब तो ज़िंदगी की बस एक तस्वीर बनाना बाकी है
कोई तो मिले और कहे मुहब्बत निभाना अभी बाकी
क्रोध का रुद्राक्ष लपटे शेर का बाल ताबीज मे बांधे
ऐसे अजब इंसान को मुहब्बत समझाना अभी बाकी है
न समझ पाया सार तत्व गीता रामायण महाभारत का
आज मानव मन के अंदर तो मुहब्बत जमाना बाकी है
कृष्ण ने की थी सहायता द्रौपदी की,लुट तो तब भी गई
न कुरेदो उस संस्कृति को,अपनी संस्कृति बचाना बाकी है
सत्तासीन तो अंधा तब भी था, ऊपर से तुर्रा गांधारी का
इतिहास खुद को दुहराता है,क्या संजय का आना बाकी है
यह गंगा को दिया श्राप था या देवव्रत का भीष्म प्रलाप
कलयुग का हुआ शुरवात किस-किस को बताना बाकी है
गुनेश्वर
आ तुझे स्नेह की धरा पर सोच का सिद्धान्त दूँ
उंगली ना उठा सके इस तरह का ईमान दूँ
जो उकेरी जाएँगी तस्वीरे मौसम के मिजाज की
उस मिजाजे-मौसम को तिरी मुहब्बत का नाम दूँ
न डर, खोने न दूंगा, वजूद तेरा हकीकत के सागर मे
ये सृष्टि का समूह तुझ सा बना रहे उन्हे ये काम दूँ
खूबसूरत शब्दों की मर्यादा का बेखौफ इंतजाम कर
इंसानियत-ए हकीकत का तेरी लोगों को पैगाम दूँ
तीज त्योहार मे सभ्यता से सांस्कृतिक गले मिल
जीवन सार्थक हो ऐसा ही कोई मंत्र नजरे-आम दूँ
गुनेश्वर
शहर की गलियाँ अनजान रहने लगी है
आजकल वो बहुत परेशान रहने लगी हैं
बेरिकेट के साये मे जीती है ज़िंदगी
बटालियन को देख हैरान रहने लगी है
छिन गई है आजादी चप्पे चप्पे की
संकरी गली भी वीरान रहने लगी है
दर्द भी सुख चुका खुरचने की इंतेहा है
ज़िंदगी अब खुद मेहमान रहने लगी है
दर्द की कसीदाकारी मे है वो मादरजाद
चीख पुकार जैसे वरदान रहने लगी है
गुनेश्वर
मैं उनके मुकाम तक जब आ जाऊँगा
वाह-वाह का दामन मैं भी निभा जाऊँगा
न कोई बैर न छल कपट मेरा उनसे
मेहनत मे हूँ,इक सीढ़ी तो पा जाऊँगा
वो मुझसे टूट के मिलते हैं हमेशा
उनके गजलों का दिया सजा जाऊँगा
लोग गुबार निकालते हैं गाहे बगाहे
वक्त आयेगा मैं सब को जता जाऊँगा
टूटता है हर बार सरगोशीयों के जहर से
सोचता है अब इश्क का राज बता जाऊँगा
गुनेश्वर
ज़िंदगी यूं ही चलता जा रहा है
मन तो बस जलता ही जा रहा है
मौन हो गई एहसासों की गर्मी
सूरज भी अब ढलता ही जा रहा है
शब्द कभी अमृत सा लगता था
जाने क्यूँ खलता ही जा रहा है
क्रोध इतना बढ़ गया मन का
आग मे पिघलता ही जा रहा है
मुहब्बत अंजुरी भर भर थी कभी
अब बस हाँथ मलता ही जा रह है
वो बच्चा पैदा हुआ सड़कों पर
बेहिचक वहीं पलता ही जा रहा है
मक्कारों की इस भरी दुनिया मे
देह से देह मसलता ही जा रहा है
गुनेश्वर
मैं जब भी उदास होता हूँ
पसीने को अपने चाट लेता हूँ
नमकीन सी महक होती है
मैं उदासी उसमे बाँट लेता हूँ
करतबी है दुनिया जुगाड़ मे
मैं पसीने की रोटी गाँठ लेता हूँ
थक कर जो चूर हो जाऊँ मैं
मेहनत की रोटी काट लेता हूँ
भूख गर न सही जाये मुझसे
खुद ही खुद को डांट लेता हूँ
गुनेश्वर
जब उदास होता हूँ पसीना चाट लेता हूँ
नमकीन सी महक से उदासी बाँट लेता हूँ
मेरे शब्दों को अर्ज का तुम इक दुपट्टा देना
गुमराही के वो सारे पट मैं बंद कर लूँगा
गुनेश्वर
कहतें हैं पथ्थर सी सूरत है तू
बेहतरीन न सही खूबसूरत है तू
तेरी जानिब रहूँ मैं, तू हाँ कह दे
बहुत प्यारी भली सी सीरत है तू
न-मालूम मुहब्बत किसे कहते हैं
मुझे लगता है मेरी जरूरत है तू
चंद अल्फ़ाजों मे संवार दूँ तुझको
पहली मुहब्बत की मुहूरत है तू
न सोच अब कुछ, आ साथ चल
मेरे मन मंदिर की मूरत है तू
गुनेश्वर
आओ गजल को आत्मसात करते हैं
हिन्दी के प्रचार का प्रयास करते हैं
धुंधली-धुंधली होने लगी हैं तस्वीरे
राष्ट्र-भाषा मे आओ वास करते हैं
साहित्य की अनछुई दीर्घा मे बैठ
भाषा के सानिध्य मे प्रवास करते हैं
खो चुका है शब्दार्थ का साहित्य
माधुर्यता क फिर ,एहसास करते हैं
गरल का लेप लगा शब्द रो रहा
सात्विक्ता के लिए कुछ खास करते हैं
दोराहे पर जिन्दगी छुटी है अब तो
मेरा वजूद मुझे नकारता नहीं फिर भी
मुक्तभाव
शब्द की खिड़की पर तुम अर्ज का दुपट्टा रखना
अलंकारों की शागिर्दी के लिए इक पर्चा रखना
संस्कारों के सानिध्य का विराम न होने पाए
चरमोत्कर्ष आस्था रहे और इसका चर्चा रखना
गुनेश्वर
झ पर एक एहसान किया था उसने
अपना प्यारा सा नाम दिया था उसने
मुफ़लिसी मे जी रहा था बेज़ार था मैं
अपने पास बुला काम दिया था उसने
कैसे करूँ अब मैं शिकायत खुदा से भी
फरिस्ता भेज कर पैगाम दिया था उसने
जो होने लगा विश्वास मुझ पर उनका
मुहब्बत से सारे आराम दिया था उसने
हर सुंकू का इंतेजाम किया था उसने
कैसे न कहूँ चारो धाम दिया था उसने
गुनेश्वर
हादसों ने बड़ी शिद्दत से संभाला है मुझे
मैं हमेशा जिंदा रहूँ ऐसा ही ढाला है मुझे
कई-कई लम्हे तन्हाइयों ने घेरा है मुझे
मुक्कद्दस जज्बे ने गमों से निकाला है मुझे
एहसासों को भींच लिया था मैं डरते डरते
मेरी अदा को वो कहते हैं मार डाला है मुझे
चाहा बहुत मैं अपनों मे अपना बन कर रहूँ
छु न जाये परछाईं मेरी,उन्होने टाला है मुझे
जिस्मानी खूबसूरती की नहीं चाह है मुझे
बस उनकी दिलकश हँसी ने पाला है मुझे
गुनेश्वर
गफलत की चाँदनी मे आज नहा तू लूँ
शौक को मेज के नीचे से मँगवा तो लूँ
ठेका ठूक गया है सामाजिक चेतना का
पेनशनी बूढ़े से अंटी मे कुछ डलाव तो लूँ
मुलाज़िम हूँ सरकारी, सत्ता जैसा ही हूँ
किसानो की भी मैं धोती उतरवा तो लूँ
घुसपेठिये सीमा पार से आतें हैं आने दो
वोट-बैंक है वो, नकली कार्ड छपवा तो लूँ
चाटुकारी की सत्ता है, साथ चुना-कत्था है
जो बचा है उसमे भी मैं चुना लगवा तो लूँ
गुनेश्वर
क्यों फिर से मुझे गमों ने घेरा है
प्यार ने क्या फिर से मुह फेरा है
बड़ी मुश्किलों से टूट कर जुड़ा हूँ
लगता है,जहाँ मे,नहीं कोई मेरा है
मिटाने की हद तक मिटाया गया
कहतें हैं, क्या बचा है,क्या तेरा है
खुल कर नही आया कोई सामने
हर दिन इंतजार मे,हुआ सवेरा है
सोचते रहे,डूब जाऊँगा,एकाकी मैं
अब तक ऐसा,नही कोई लुटेरा है
शुभ दिन की वह हर रात दीवानी हो जाए
पत्थर छु लो तुम पिघल कर पानी हो जाए
हर्फ-हर्फ मे तो दिल ही झलकता है तुम्हारा
मुहब्बत की हर कोशिश ज़िंदगानी हो जाए
कतरा कतरा सहेजा है प्यार जहाँ के लिए
बस वो प्यार तो खुद ब-खुद सयानी हो जाए
भूख नहीं प्यास नहीं लगे हो अपने देश के लिए
चाहता हूँ ये हस्ती और भी जानी मानी हो जाए
:::::::::::::::::::::::::::::: ::::::::::::गुनेश्वर,
रो रो कर तो उसका बहुत बुरा हाल हो गया
सब कहते हैं शर्म से चेहरा लाल हो गया
आने का कह गए पिया,नही आ पाये सीमा से
खबर भी नहीं,न पत्र ही,ये कैसा हाल हो गया
आस लिए खुशी से रात भर न सोती थी बेचारी
रक्षक, न आए अबतलक,और दस साल हो गया
हम सब घरों मे अपने खुशियों मे मशगूल हैं
उसकी उन आँखों मे रो-रो कर जाल हो गया
अब तो कोई बता दे खाविंद जिंदा है या मुर्दा
सुख कर तो जिस्म उसका खाल हो गया
रफ्ता रफ्ता कट जाएगी यह ज़िंदगी भी उसकी
व्यवस्था देश की उसके लिए गर्तो-गाल हो गया
जो पता चला जिंदा है, अब तक खाविंद पड़ोस मे
द्वारे खड़ी राह तकते उसका इंतकाल हो गया
तुम राहों मे मेरे, काँटे बिछाते चलो
जो मैं गुजर जाऊँ,,उन्हे उठाते चलो
सभी के पाँव नहीं कठोर, मुझ जैसे
रिस्ता तो उनसे, तुम निभाते चलो
मैंने नहीं छोड़ि है, मंजिलों की आस
मेरी एवज मे ये, सबको बताते चलो
कहता हूँ मैं तुम्हें, एक मुकाम दूंगा
मेरे यकीं को, खुद मे समाते चलो
मैं तो पा ही लूँगा अपनी सार्थकता को
तुम यह बात जमाने को जताते चलो
गुनेश्वर
क्यों रोकते हो मुझे, मेरे ही अरमान सजाने से
तुम तो डरते हो, मुझे भी डराते हो, जमाने से
कोख को मैं अपने, कितने जतन से पाल रहीं हूँ
कैसे आदम हो डरते हो,इस बात को निभाने से
मुर्गे, बकरा, भेड़, गाय काट खाते हो बड़ी बेदर्दी से
दफन हो जाएगी यदि बेटी है, भागते हो, टकराने से
नहीं उगेगी कभी पौध, इस धरा पर मुहब्बत की
कितने बेदर्द हो नहीं डरते, कोख को मिटाने से
दहलीज पर घर की कौन लुढ़काएगा, चाँवल सगुन का
मन मे यह भय है तुम्हारे, छिपते फिरते हो जताने से
मेरे कमीज मे बटन टाँक देना,यह बात क्या कह पाओगे
क्यों नहीं समझते,तुम आदम,हर बार तुम्हें समझाने से
सगुन की मिठाई,पान के पत्ते पर सुपारी ,किसके लिए रखोगे
इस बात को मानो, कुछ होगा क्या इससे,खुद ही झुठलाने से
पत्नी के लिए दो शब्द, ह्रदय की गहराइयों से
ख्याल तुम्हारा मेरे मन मे आया होगा
तुमने खुद ही सज के मुझे दिखाया होगा
वो ललाट का बाँकपन, वो कमसिन सी अदा
जुल्फों को यूँ मुख पर डाल बहलाया होगा
पाजेब का वो घुंघरू, खनकता वो कंगना
सुरमई गीतों से प्यार बरसाया होगा
प्यार से अपने नजरों को उठाया होगा
खुदा को तुम्हारी आँखों मे पाया होगा
बलखाती लहरों का मचलना, ओ उछलना
हमारे दिल को भी यह रास आया होगा
कहते हैं सब, है खूबसूरत तेरी अदा
तेरी इसी अदा ने हमे भरमाया होगा
है ताजगी भी खूब तेरी खामोशी मे
कितनी मन्नतों के बाद तुझे पाया होगा
गुनेश्वर
गाँव की दूरी है अब खत्म,शहर-शहर जुडने लगा
हर रास्ता शहर का तो,गाँव की तरफ मुड़ने लगा
कुचली जा रही है संस्कृति, अब तो गाँव की भी
क्या करे वह बुजुर्ग, परवश परिवेश से कुढ़ने लगा
पुराना बरगद का वह शजर, कट कर गिरने लगा
सड़क चौड़ीकरण मे गाँव का भोलापन, उजड़ने लगा
मोटर कारों का शोरगुल, इतना बढ़ गया की
बछड़ा रंभाने के लिए भी, अब सिहरने लगा
लंबी लंबी साड़ियाँ सुखाई जाती थी,गांवों मे कभी
अर्धनग्न कपड़ों का प्रचलन, वहाँ भी बढ्ने लगा
चौपालों की व्यवस्था, जो थी कभी निराली
वह व्यवस्था ही लोगों को, अब खलने लगा
बुजुर्गों से सलाह लेने की, जो थी परिपाटी
इस तरह का व्यवाहर तो वहाँ, टलने लगा
खेतो का पैमाना कम-से-कमतर होने लगा
मकानो का बहूराष्ट्रीयकरण वहाँ बढ्ने लगा
बिखर गई स-हृदय मानसिकता मेरे गाँव की
मेरा प्यारा वो गाँव शहर-की तरह जलने लगा
गुनेश्वर
स्सी जल गयी मगर बल नहीं गया.
आस्तीन के सांप तेरा छल नहीं गया..
टूटी खाट,निवाड़ ढीला,कसा नहीं गया
जो बुजुर्ग जिन्दगी से, टल नहीं गया
चप्पल मे पिन लगाए कहाँ नहीं गया
हाँथ फैलाए जो जिस्म जल नहीं गया
लाख सहे ताने पर वो घर से नहीं गया
जब तक हाँथों मे पोता पल नहीं गया
हमसे उनका प्यार निभाया नहीं गया
हमारे अंतस का शैतानी खल नहीं गया
गुनेश्वर
--मुहब्बत की डगर मे तुम आओ तो सही
हल्के-हल्के ही तुम प्यार निभाओ तो सही
बंद मुट्ठियाँ भी खुल जाएँगी फूलों की तरह
खुद को खुद से तुम कभी मिलाओ तो सही
एहसासों के दरिया मे ख़ुशबुओं का मेला है
खुल के तुम मन मे ये बात बिठाओ तो सही
रोने के वास्ते ही नहीं अवतरित हुए धरा मे
जख्मों की फेहरिस्त मन से मिटाओ तो सही
पाप पुण्य का अनजाना दण्ड झेल लिया बहुत
मित्र अपने अंतस के घर्षण को जिताओ तो सही
मुझको इल्जामों मे रख वो खुश होता है
सुनकर ये,दिल हमारा जार-जार रोता है
गुमनामियों की चादर ओढ़ ली थी हमने
करिने से ये दिल आँसुओं को पिरोता है
ऊमीद्दों को भी नहीं किया कभी रौशन यूँ
बारिश भी हमे जाने क्यों नहीं भिगोता है
मुझे इल्जामों मे देख सारे खुश है शायद
क्या बचा अब ये दिल और क्या खोता है
मित्र रुक जाओ ज़िंदगी का कारवाँ लिए
गमों मे जीने का भी अपना मजा होता है
गुनेश्वर
शेरों को कुछ हट के कहना चाहतें हैं
न जाने क्यों छट के रहना चाहतें हैं
कहतें हैं तजुर्बा है मुहब्बत का बहुत
फिर क्यों वो बट के रहना चाहतें है
नव-प्रवाह की भावनाओं का मोल नहीं
अपने परिवेश मे डट के रहना चाहतें है
वाह का निबाह भी अदभूत पहेली है
अपनी पोस्टों से सट के रहना चाहते हैं
मेरी ढपली मेरा राग और मेरा ही प्रसाद
चेतन सारे जाने क्यों कट के रहना चाहते हैं
गुनेश्वर
ज़िंदगी के यकीं मे
जरूरतों की बारिश बहुत है||
कोशिशों की रातों मे
गुजारिशों की साजिश बहुत है
गुमनामी के खुशबू मे
उम्मीदों की ख्वाहीश बहुत है
कतरा-कतरा सब्र मे
शैतानों की नवाज़िश बहुत है
मोम बन के रहने मे
मानवता की नुमाइश बहुत है
लुट जाने की राह मे
हरेक की फरमाइश बहुत है
मित्र तेरी जुस्तजू मे
ज़िंदगी की पैमाइश बहुत है
गुनेश्वर
अपने खुशियों का इंतजाम कर आया हूँ
आज मुहब्बत उसके नाम कर आया हूँ
अब न वो खाली है न हम खाली रहेंगे
मुहब्बत उसके भी सिने मे भर आया हूँ
बड़ी मुद्दत हुई दिल खोल कर बोले हुए
आज अपने ही सौदे से मैं तर आया हूँ
कभी सजदे मे भी न झुका ये सर मेरा
उनके लिए मैं “मैं” की सीढ़ी उतर आया हूँ
क्या ही उम्दा सी हक़ीक़त ले कर मित्र
आज मैं कितनों बरसो बाद घर आया हूँ
गुनेश्वर
बीना बात के उसने मुझे ये बात कह दिया
उसने मुझे किस बात पर ये बात कह दिया
क्या कहूँ बातों बातों मे ये बात कह दिया
जानु क्या किन बातों मे ये बात कह दिया
बातों बातों मे उसने जाने क्या बात कह दिया
बात पर रोता रहा ,कहता मुझे बात कह दिया
बता तो तुझे किस बात पर बात कह दिया
बात के बाद बात,या बात पे बात कह दिया
मित्र न मालूम क्यूँ उसने मुझे बात कह दिया
खता न बताया और बात पर बात कह दिया
गुनेश्वर
चादर की कीमत पर पैर फैला दूँ क्या
या मैं तकदीर को खुद ही हटा दूँ क्या
टूट गया बचे पत्तल का पुलाव समेटते
मैं समृद्धि की राह का रोड़ा मिटा दूँ क्या
लहू-लुहान हुआ जाता है जिस्म, मन का
मनन का मतलबी मशाल उठा दूँ क्या
बुत-परस्ती की आदत का क्या करना है
ढोंगी साधुओं से खुद को सटा दूँ क्या
कौन है गद्दार कौन मतलबी न मालूम
अपने हिस्से का स्वर्ग भी लूटा दूँ क्या
किस तरह जिया जाय ज़िंदगी का नमक
पत्तल की आस मे खुद को खटा दूँ क्या
मित्र तंग रातों के पैबंद सुलझा दूँ क्या
रोटी के लिए सांझा चूल्हा बिठा दूँ क्या
गुनेश्वर
इशारों इशारों मे, इरादा, निभा गया
और वो, खुद को, मुझसे हटा गया
सुंगंध की तरह, समाया था, कभी
खुद को, रेत सा, आज जता गया
मेरी ज़िंदगी का, किनारा, रहा वो
जो गया, न कोई, पता बता गया
लिपट जाती, उसकी परछाइयों से
क्यूँ?इस तरह., वो मुझे, सता गया
मेरे भरोसे मे, केकटस, उगा गया
वक्त, मासूमियत से, बिता गया
गुनेश्वर
मित्रता सूची से हटाने की आदत सी लगती है
खुद के मैं को निभाने की आदत सी लगती है
बस लाईक करूँ, कमेन्ट न करूँ तो झिकता है
उसे खुद को भरमाने की आदत सी लगती है
सृजनात्मक्ता ऐसी की वाह की जरूरत नहीं उसे
यह जनता है पर मनवाने की आदत सी लगती है
खूबसूरत मुक्तके हैं, गजलों की बात ही निराली है
अपनी श्रेष्ठता को, जताने की आदत सी लगती है
हमारे लाईक मे भी मुहब्बत की गरीमा होती है
समझता नहीं, कहलवाने की आदत सी लगती है
गुनेश्वर
मेरी गलियों मे, तेरा आना जाना हुआ
क्या फिर से मुहब्बत, निभाना हुआ
मुझसे रूठ कर, चले गए थे, तुम कहीं
प्यार का मेरे, न तुमसे, भूलाना हुआ
आग तो इधर भी बराबर ही लगी है
तुम्हें देखे हुए इधर भी जमाना हुआ
क्यूँ ईस तरह तकरार की सरहदों मे रहें
प्यार का नया न कोई भी तराना हुआ
आओ ,आ भी जाओ न फिर एक बार
कई दीनो से दुनिया को न जलाना हुआ
गुनेश्वर
खूबसूरत सी गजलों के मानिंद रहो
तुम गजाला हो फूलों की मानिंद रहो
यह शुभ दिन आए जीवन मे बार बार
तुम सृष्टि मे खुशबू की मानिंद रहो
हर खुशी तुम्हारी परछाई बन कर चले
तुम धूप मे शीतल चाँदनी के मानिंद रहो
साहित्य सृजन की कलात्मकता मे बसी रहो
सृजनात्मक सुगंधित स्याही की मानिंद रहो
ढ़ोल नगाड़े भी आज बज उठेंगे खुद-ब-खुद
हर आवाज मे गीत और संगीत के मानिंद रहो
अपने खयालों की इक किताब देना
वो पुराने खतों का भी हिसाब देना
रूसवाइयों का डर लगा रहता है
फिर से मुझे वही पुराना शबाब देना
मैं खाविंद के भरोसे मे रहना चाहती हूँ
मुझे नई ज़िंदगी का तोहफा नायाब देना
प्यार की सरहदें अलग, मजबूरीयाँ अलग
मैं सुकून से रहूँ, मुझे ये आफताब देना
तुम जानते हो मैं संगदील नहीं
तुम सुकून मे हो बस इसका जवाब देना
गुनेश्वर
मुझ पर एहसानों का मुल्लाम्मा चढ़ा रहा है
सरे बाज़ार वो एहसान फरामोश बता रहा है
हर वक्त मेरा भी उसकी यादों मे बीतता है
शायर है वो, पर खुद को दरवेश बता रहा है
इस तरह अपनी यादों मे अजनबी हो गया हूँ
मेरे सोच को पूर्वाग्रह मे समावेश बता रहा है
एहसान फरामोशी का किरदार चस्पा कर रखा
मेरे अंदर के आवेग को, वो आवेश बता रहा है
मित्र मैं दक़ियानूसी सलाखों से भेदा नहीं करता
रुसवाइयाँ करता, उँगलियों से खामोश बता रहा है
गुनेश्वर
हमारा आना जाना न हुआ तो क्या हुआ
मुहब्बत दिखाना न हुआ तो क्या हुआ
हमारी भी मुहब्बत को न समझा कोई
हमसे मनाना न हुआ तो क्या हुआ
कब समझा अपना, और ये तल्खियाँ
पर हमसे सताना न हुआ तो क्या हुआ
कई शामे तेरी महफिल मे गुजारी थी
हर बार आना न हुआ तो क्या हुआ
साँप आस्तीन मे छुपा कर नहीं रखते
गमों का बहाना न हुआ तो क्या हुआ
रूठ कर दिल ही निकाल लेते हैं अक्सर
खुद को और भरमाना न हुआ तो क्या हुआ
न कोई गम इधर है न कोई गम उधर है
प्यार फिर जताना न हुआ तो क्या हुआ
नफ़रतों को शहद बना पिलाया हमे तुमने
पर गैर तुम्हें कहना न हुआ तो क्या हुआ
राह चलते मुलाक़ात हो, दुआ सलाम कर लेंगे
ताउम्र मित्रता निभाना न हुआ तो क्या हुआ
गुनेश्वर
वो मुझसे मेरे ही अरमान माँगता है
वो मुझसे फिर क्यूँ एहसान माँगता है
खत जला कर फेंका दिया था हमने
उन खतों मे फिर से जान माँगता है
न मिलने के लिए जुदा हुए थे कभी
उन्हे भुला कर नया तान माँगता है
क्यूँ दिल इस कदर था आवारा हुआ
मुहब्बत का फिर वरदान माँगता है
जख्मी कर गया था कभी दिल हमारा
भूल जाने का आज अरमान माँगता है
दिल जब विरानियों मे रोता है
ये जख्म और भी तो गहरा होता है
महफिल मे सारे मुसकुराते हैं
गमों मे हमारा दिल जार जार रोता है
कोतूहल होती नहीं किनारों की पहचान
अश्क हमारा ही हमे रोज डुबोता है
मुद्दत हो गई सुकुने बारिश मे नहाये
ओस चाट कर सत्व अपना खोता है
क्यों मेरी तन्हाइयों पर यकीं नहीं तुमको
पथरीली जमीं पर ही मेरा जिस्म सोता है
मेरे अशकों पर यूँ एतबार मत करो
मुझसे अब तुम भी तो प्यार मत करो
पीकर हुआ जा रहा हूँ मैं मदहोश
आवारगी का अब तो त्योहार मत करो
डूबने के लिए किनारा है काफी
यूँ इस तरह से तुम मझधार मत करो
जो चल रहा है सिलसिला चलने दो
गुमनामियों का यूँ सँहार मत करो
कब्र मे रख कर मित्र न ठहरेगा कोई
चार काँधों का यूँ भी सत्कार मत करो
अपनत्व का तुम एहसास दिलाया करो
इन गलियों मे भी कभी तो आया करो
ढूँढने की तपिश तो बाकी है यारों
हमसे भी तो कभी हाँथ मिलाया करो
निगाहों मे मस्तियाँ और वो बाँकपन
कभी कभी ही सही, हमे सहलाया करो
रुसवाइयों का शहर तन्हाइयों का शजर
इन बातों से न तुम यूँ भरमाया करो
पता है रूह तक उतर जाऊँगा यकबयक
हमारे इस यकीं को तो निभाया करो
गुनेश्वर
Monday, 22 July 2013
मुझ पर एहसानों का मुल्लाम्मा चढ़ा रहा है
सरे बाज़ार वो एहसान फरामोश बता रहा है
हर वक्त मेरा भी उसकी यादों मे बीतता है
शायर है वो, पर खुद को दरवेश बता रहा है
इस तरह अपनी यादों मे अजनबी हो गया हूँ
मेरे सोच को पूर्वाग्रह मे समावेश बता रहा है
एहसान फरामोशी का किरदार चस्पा कर रखा
मेरे अंदर के आवेग को, वो आवेश बता रहा है
मित्र मैं दक़ियानूसी सलाखों से भेदा नहीं करता
रुसवाइयाँ करता, उँगलियों से खामोश बता रहा है
तुम्हारे पैमाने पर खरा उतर तो जाऊंगा
पर पैमाने पर क्या अँगुली उठा पाऊँगा
मंचीय सज्जा के सत्व से दूर रहता हूँ
एहसानों मे दबे लोगों को क्या जुटा पाऊँगा
गुमनामियों मे रह जाऊँ क्या फर्क पड़ता है
अव्यवहारिकता से तो खुद को हटा पाऊँगा
ये तेरी मर्जी है जी ले जिस तरह से चाहे
मजबूरीयों की मज्जा से खुद को कटा पाऊँगा
फिर बजा लेना ढ़ोल मजीरे जितनी तू चाहे
मैं अपनी बेबाक मर्जी से खुद को सटा पाऊँगा
तुझे खुद के हित के अलावा कुछ दिखता है
दूसरे की मुहब्बत पर व्यपार तेरा सिकता है
अलाव जलाए बैठा है साहित्य की तलहटी मे
कोई अँगुली उठा दे उस पर क्यों झिकता है
टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों मे चलना आदत हो गई
सरल दिखता है, पर उस पर कहाँ टिकता है
झांसे की भी सर्गर्मियाँ हैं, बड़ी तेज यहाँ पर
उच्चकोटी का साहित्य भी कहाँ दिखता है
मित्र रोटी सेक ले इस अनसुलझे सत्य पर
स्निग्ध हुआ जा, तभी ऐसा कुछ बिकता है
वो सबको रास्ते पर पड़ा पत्थर समझता है
गुरूर देखो कहता है वो किस्मत बदलता है
जुडते हैं सब मुहब्बत के साथ उस शख्स से
यकीं करता है पर खुद की सोच पर चलता है
दीवारों पर चस्पा करता है रंग बिरंगी तस्वीरे
नियमों की आड़ मे वो चाँदनी से भी जलता है
गुनाह न मेरा था , गुनाह न कभी उनका रहा
पर संकीर्ण सोच की परिधि से,नहीं निकलता है
मित्र गर मुझमे गुरूर है तो आ मुझे समझा ले
इस बात पर भी तो वो कभी नहीं मचलता है
देह की धूप का आज तपन देख ले
मुझको आज ऐ मेरे वतन देख ले
जालिमो ने किया लहू लुहान मुझे
जिस्म पर दर्द का तू लगन देख ले
मेरा दिल पाकीजा था ऐ अहले वतन
मिरी खुद्दारी का तू आज चमन देख ले
उफ न निकला मेरे भी जुबाँ से कभी
देश पर मर मिटा मेरा मगन देख ले
इश्क अपने देश से करता रहा ताउम्र
आज मेरा हश्र और मेरा कफन देख ले
हमारा आना जाना न हुआ तो क्या हुआ
मुहब्बत दिखाना न हुआ तो क्या हुआ
हमारी भी मुहब्बत को न समझा कोई
हमसे मनाना न हुआ तो क्या हुआ
कब समझा अपना, और ये तल्खियाँ
पर हमसे सताना न हुआ तो क्या हुआ
कई शामे तेरी महफिल मे गुजारी थी
हर बार आना न हुआ तो क्या हुआ
साँप आस्तीन मे छुपा कर नहीं रखते
गमों का बहाना न हुआ तो क्या हुआ
रूठ कर दिल ही निकाल लेते हैं अक्सर
खुद को और भरमाना न हुआ तो क्या हुआ
न कोई गम इधर है न कोई गम उधर है
प्यार फिर जताना न हुआ तो क्या हुआ
नफ़रतों को शहद बना पिलाया हमे तुमने
पर गैर तुम्हें कहना न हुआ तो क्या हुआ
राह चलते मुलाक़ात हो, दुआ सलाम कर लेंगे
ताउम्र मित्रता निभाना न हुआ तो क्या हुआ
मेरे प्यार की और कितनी मुझे सजा दोगे
ताउम्र चाहता रहूँगा, क्या मुझे मिटा दोगे
सहेज रखना फूलों को ये हमारी फितरत है
काँटो से उलझते हैं, और कहाँ उलझा दोगे
सब्र है हमारा जीवन की अरुणीम अभिलाषा
मुहब्बत को हमारे क्या इसतरह घटा दोगे
सकल ज्ञान की हो तुम सम्पूर्ण परिभाषा
संघर्षों का हूँ मैं विश्लेषण,क्या भगा दोगे
जरा, बदल लूँ,अपनी फितरत की मैं तासीर
मेरी शालीनता को क्या काँटो से चुभा दोगे
गुनेश्वर
वक्त के बिस्तर से, तू सलवटों की चादर हटा दे
एक बच्चा चाहता है सोना, उसे सुकून से सुला दे
नहीं है हमारी ज़िंदगी मे संगीत का कोई दुपट्टा
बचपन को सुकून का छाँव दे , गमो से हटा दे
मृगमरीचिका है, ज़िंदगी मे, कोई अनोखा तोहफा
याद कर,मनन के ममत्व को, आज नई दिशा दे
बिवाइयाँ पड़ गई हैं तप्त रेत मे नंगे पाँव रहते
अपने आँसुओं से ठंडक के उस एहसास को हवा दे
बहल जाएगा आज अपने बच्चे का भी कोमल मन
“”बस होठों की पथरीली सतह से जी भर मुस्कुरा दे””
गुनेश्वर
भूलकर, तुम, फिर मिले इस कदर मुझे
जैसे कुछ भी, हुआ नहीं हो, असर मुझे
जुबाँ मेरी खामोश थी, बंद रास्ते रहे
ढूँढता रहा, कई दिन, मेरा ही शहर मुझे
बीती रात, हकीकत से, जो सामना हुआ
लगा की, आईने ने, दे दिया, जहर मुझे
ये कैसी है ज़िंदगी, जो जी रहा हूँ, मैं
डुबो रही है, मेरे आँसुओं की, लहर मुझे
थी तुमसे दोस्ती, तुमसे ही प्यार रहा
लूटते रहे तुम, जाने क्यों, हर पहर मुझे
गुनेशर
लिख कर नाम मिटाना उसकी आदत है
वो कातिल मुहब्बत से शर्मिंदा करती है
रोज हमसे ही काम का गुहार करती है
पर हमेशा वो सरे बाजार निंदा करती है
हाँथ थामा तो समझा तकदीर खुल गयी
जो मिली, रुला रुला के जिंदा करती है
एशों आराम सारे दिये जी भर भर के
पलंग तोड़ती, पूरा जीवन गंदा करती है
शाली से जरा क्या हँस बोल लिए कभी
मुहल्ले-मे सब के सामने पंगा करती है
बड़ी गुस्सेल है वो नकचढ़ी छप्पन छुरी
बेरहमी से मार मार के चंगा करती है
कासे कहें, कैसे कहें दुख भरी बातें मित्र
बात-बे-बात न जाने क्यों दंगा करती है
गुनेश्वर
तुम डिबरूगढ़ की शहजादी
मैं कुम्भ मे बिछुड़ा आवारा
तुम पानी की लगती फुहारें
मैं समन्दर का झाग खारा
तुम हो चन्दन की खुशबू
मैं मुनिसपालिटी का बेचारा
तुम वीणा की झंकृत वाणी
मैं झींगुरों सा कीर्तन प्यारा
तुम हो गंगा की नैसर्गिक्ता
मैं उथला नलकूप हूँ हारा
तुम लगती गीता की सौगंध
मैं अपनी कविता मे बंजारा
तुम शीतल शब्दों की गरीमा
पर मित्र मुझे पुकारे दोबारा
गुनेश्वर
भाँति भाँति के लोग पधारे, जीवन होता जाता मृदंग
अनुज पधारे चितचोर मुकुट धारे भाई भावज के संग
कलरव करती मृगनयनी, सुन सखा के प्रेंमातुर प्रसंग
झरने कल-कल बहते,चहकते पक्षी, देख हो जाते दंग
रंगबिरंगी तितलियाँ उड़ती मधुबन मे बाला के संग
देखो देखो, सुनो सुनो कैसे है बाजे आज जलतरंग
हरीतिमा तो है खूब लहराती, जैसे बलखाती नदिया
सौंधी सौंधी खुशबू आती और सब होते जाते मलंग
संकरा होता जाता गलियों का विस्तार और मन तंग
दिव्य स्वप्न टूटा कैसे, हे मित्र, मन मे है भरपूर जंग
गुनेश्वर
कभी निखर जाना मेरी याद मे
खुद ही चली आना मेरी याद मे
बैठा मिलुंगा मैं एक शब्द लिए
छुना और शरमाना मेरी याद मे
छुकर हौले से गुजर जाएंगी हवा
तन्हा दुपट्टा गिराना मेरी याद मे
नम आँखों मे सर्द हथेलियाँ रख
नया एहसास पाना मेरी याद मे
नजर का टीका जो लगे गालों पर
आज फिर सँवर जाना मेरी याद मे
मुद्दतों गुजरी है खिलखिलाए हुए
हँसी की बारिश सजाना मेरी याद मे
कैद तुम भी हो और कैद मैं भी
तस्वीर से निभाना मेरी याद मे
गुनेश्वर
दास्तान है संघर्षों का, आराम कहाँ
डूबता रहा,शताब्दियों मे, शाम कहाँ
निर्वाह कब तक, कसक की अन्त्येष्टि
रक्त धमनियों मे जाम है, नाम कहाँ
रिक्तता समृद्धि है,अंतस का आर्तनांद सुन
सार्थकता शोकाकुल,खुशियों का पैगाम कहाँ
हरीतिमा का हस्तांतरण, कंक्रीट मे पैवस्त
रासायनिक रक्त, शुक्राणुओं का धाम कहाँ
ईर्ष्या का एश्वर्य और वासना का मधुमास
जातिगत संघर्षों मे मित्र अब विराम कहाँ
गुनेश्वर
रसिकता लमपट हो ही जाती है
आप सादगी से प्यार किया करें
अधरों पर आपकी ये जो हँसी है
आप नजरों से इकरार किया करें
काँपती उँगलियाँ लटों मे उलझी हैं
लीनता पर आप एतबार किया करें
शिकन न हो माथे की बिंदीया पर
आँखों मे सजा इजहार किया करें
शाने पर जुल्फों का जन्मदिन हो
प्रेम के कारवें का इंतज़ार किया करें
गुनेश्वर
शाम की धड़कन मे शब्द का श्रिंगार कर लूँ
धूप की स्याही से एक गज़ल तैयार कर लूँ
खूबसूरती का समन्दर गंगा की मानिंद है
हिम की ओढनी सा आज व्यवहार कर लूँ
गगन की शागिर्दी मे ज़िंदगी का जुनूँ देख
शीला को मूर्ति बना मैं उसी से प्यार कर लूँ
होलिका की राख़ लगाते हम सामाजिक सारे
प्रहल्लाद की छुवन पर आज एतबार कर लूँ
क्या कुत्सित रहा दुर्योधन का ही चेतन मन?
या भीष्म के भीष्म प्रीतिज्ञा पर प्रहार कर लूँ
द्रोपदी का चीरहरण किन पापों का प्रायश्चित
महभरात के पात्रों का क्यूँ न संहार कर लूँ
बेटियाँ संघर्ष कर रही आज प्रेम का पतन देख
भ्रूण मिटाने वालों का क्यूँ न प्रतीकार कर लूँ
गुनेश्वर
अपने घर के आईने मे प्रेम का समन्दर रख
सुकून से जी ले, आँखों मे प्रेम का मंजर रख
बे-अक्लों की बालियाँ आजकल उबाल पर हैं
बस अपने प्रयास मे मुहब्बत का खंजर रख
जिव्हा लोलुपता की लार पर टिकी है चहुंओर
हरीतिमा का बीज रख, न जमीं को बंजर रख
अब तो सिंदूर के सत्व का ज्ञान लुप्तप्राय है
भविष्य मे भाल की मर्यादा का ही मंतर रख
रुखसत हुई जा रही संघर्षरत सौभाग्य की लकीरें
घरद्वार पर पावन संस्कृति का तू इक जंतर रख
गुनेश्वर
मेरे भाव
अपने हुनर का इस्तेमाल कर लिया करो
इधर भी प्यार का लहर कर लिया करो
खाकसार, नाचीज, नादान कहतें हैं सारे
इस ओर भी एक नजर कर लिया करो
तुम्हारी तस्वीर लिए हम बुत बन जाते हैं
अदाओं का इधर भी असर कर लिया करो
टोढ़ी पर तिल देख दर्पण भी शर्मा जाती है
इस दिलकश हँसी का सफर कर लिया करो
रूह तक उतर जाये ऐसी शर्मो-हया तुम्हारी
इधर भी मुसकुराते हुए अधर कर लिया करो
गुनेश्वर
बादलों का ओंट ले शामियाना बना दूँ
हवाओं के चादर से,आशियाना बना दूँ
रिमझिम फुहारों की शीतलता मे आज
हुस्न को जो देख ले दीवाना बना दूँ
रुबाइयों मे रहे जो रहमतों की बारिश
साहित्य को सौंदर्य का मुहाना बना दूँ
गजल बह्र मे कहने की है बात अच्छी
भावों मे कहने का भी ठिकाना बना दूँ
रुख पर तिल, रुखसार कातिल सी लगे
अदाओं से जन्नत को निभाना बना दूँ
महत्व का प्रसाद सत्व का साहित्य रहे
अनर्गल प्रवाह को अब निशाना बना दूँ
बचपन के अलिखित अबूझ गुंजन को
पिरो चंचलता की चुहल सुहाना बना दूँ
Sunday, 21 July 2013
नित्य नई सोच का मैं सिद्धान्त कैसे पालूँ
मौन हो चुके निर्वाह का व्यख्यान कैसे पालूँ
कन्दराओं मे जा रहूँ मैं भी गर्वित मन से
संसारिक सभ्यता का मैं आख्यान कैसे पालूँ
गौर करता रहा मैं सौंदर्य के लालित्य पर
लालित्य के सोहार्द मे, मैं जान कैसे पालूँ
महिमायुक्त शब्द सेतु भी टूट रहे शने:शने”
शब्दों मे सत्विक्ता का तो ज्ञान कैसे पालूँ
कुबड़ी हो रही है मौलिकता की सार्थकता
उस सार्थक्ता का मैं अभीमान कैसे पालूँ
विभूषित हो रहा असभ्यता का संस्कार अब
सौतिहा-डाह के कराह मे, मैं प्राण कैसे पालूँ
हिन्दी को शौक का साहित्य परसोता पार्थ
उत्कृष्टता के प्रवाह का मैं शान कैसे पालूँ
गुनेश्वर
सौतिहा-डाह = विदेशी असभ्य संस्कृति जिसे
हम अपनाते जा रहे हैं||
मेरे शब्दों की पगडंडियों पर चल के आ
मैं अलग हूँ मुझ तक जरा संभल के आ
[प्रथम दो पंक्तियाँ मधु कवि की महफिल]
मौन हूँ मैं मनन का साहित्य दे रहा हूँ
आ जरा जल्दी जल्दी तू मचल के आ
नेह की धरा पर सात्विक्ता का कीर्तन हूँ
न तू अब इस तरह बिचल-बिचल के आ
खौफ का नहीं है संगीत, न मैं दे रहा हूँ
लालित्य का गीत हूँ तू बस चल के आ
तू भी समझ ले कोख का कलरव अब तो
न ले मातृत्व की आह, जरा संभल के आ
गुनेश्वर
दूर गगन की छाँव मे अपना आशियाना चाहिए
चाँद की भरपूर चाँदनी धूप की रौशनी चाहिए ||
कर सकु साहित्यक सृजन, शांत बैठ एक कोने
मन मे सुकून और मनचाही खुशी चाहिए ||
कह दूँ ऐसा कोई सच, जो सच के काबिल हो
रौशन कर सकूँ जहाँ, ऐसी खूबसूरत चाँदनी चाहिए ||
कर लूँ आलिंगन सबके भावनात्मक अहसासों का
उत्कीर्तन कर सकूँ,स-हृदय जीने की कोशिश चाहिए||
परवश न हो जाऊँ पारितोषक के अव्यवहारिकता का
परछालना कर लूँ मन, उसकी भी समझाईश चाहिए ||
दूर गगन की छाँव मे अपना आशियाना चाहिए
चाँद की भरपूर चाँदनी धूप की रौशनी चाहिए ||
guneshwar
Sunday, 7 July 2013
छलावा है ढोंग है पाखंड है
छलावा है ढोंग है पाखंड है
वजूद इंसान का खंड-खंड है
हैं मेहनतकश सारे ही यहाँ
पर रोटी का सवाल प्रचंड है
सदमों का इतिहास आँखों मे
वजूद यहाँ निर्जीव नरमुंड है
नहीं मरता है रक्तबीज कोई
परिपालक ही बड़ा उदण्ड है
गुम हैं बेटी शातिरी चाल मे
माँ को दिया क्यों यह दंड है
वृद्ध से मांगते हैं अब साक्ष्य
सभ्यता का फर्ज खंडखण्ड है
मौलिकता है अब लुप्तप्राय
सब को यहाँ क्यूँ घमंड है|||
गुनेश्वर
Wednesday, 3 July 2013
द्रोपदी का चीरहरण किन पापों का प्रायश्चित
साँझ की धड़कन से आज शब्द का श्रिंगार कर लूँ
धूप की स्याही से ईक गज़ल तैयार कर लूँ
खूबसूरती का समन्दर गंगा की मानिंद है
हिमाच्छादित ओढनी सा आज व्यवहार कर लूँ
गगन की शागिर्दी मे भी ज़िंदगी का जुनूँ देख
शीला को मूर्ति बना मैं उससे प्यार कर लूँ
होलिका की राख़ लगाते हम सामाजिक सारे
प्रहल्लाद की छुवन पर आज एतबार कर लूँ
क्या कुत्सित रहा दुर्योधन का ही चेतन मन?
या भीष्म के भीष्म प्रीतिज्ञा पर प्रहार कर लूँ
द्रोपदी का चीरहरण किन पापों का प्रायश्चित
महाभारत के पात्रों का क्यूँ न संहार कर लूँ
बेटियाँ संघर्ष कर रही आज प्रेम का पतन देख
भ्रूण मिटाने वालों का क्यूँ न प्रतीकार कर लूँ
गुनेश्वर
काष्ट पर शब्द का श्रींगार अलग होता है
मूर्ति बनकर उभरती है प्यार अलग होता है
सभा की गरिमा का व्याख्यान निराला है
समन्दर है खाली प्यासा हाला है
धड़कन नाचती रहे शब्दों के ताल पर
अपने घर के आईने मे प्रेम का समन्दर रख
अपने घर के आईने मे प्रेम का समन्दर रख
सुकून से जी ले, आँखों मे प्रेम का मंजर रख
बे-अक्लों की बालियाँ आजकल उबाल पर हैं
बस अपने प्रयास मे मुहब्बत का खंजर रख
जिव्हा लोलुपता की लार पर टिकी है चहुंओर
हरीतिमा का बीज रख, न जमीं को बंजर रख
अब तो सिंदूर के सत्व का ज्ञान लुप्तप्राय है
भविष्य मे भाल की मर्यादा का ही मंतर रख
रुखसत हुई जा रही संघर्षरत सौभाग्य की लकीरें
घरद्वार पर पावन संस्कृति का तू इक जंतर रख
गुनेश्वर
मेरे भाव
अपने हुनर का इस्तेमाल कर लिया करो
इधर भी प्यार का लहर कर लिया करो
खाकसार, नाचीज, नादान कहतें हैं सारे
इस ओर भी एक नजर कर लिया करो
तुम्हारी तस्वीर लिए हम बुत बन जाते हैं
अदाओं का इधर भी असर कर लिया करो
टोढ़ी पर तिल देख दर्पण भी शर्मा जाती है
इस दिलकश हँसी का सफर कर लिया करो
रूह तक उतर जाये ऐसी शर्मो-हया तुम्हारी
इधर भी मुसकुराते हुए अधर कर लिया करो
गुनेश्वर
पिरो चंचलता की चुहल सुहाना बना दूँ
बादलों का ओंट ले शामियाना बना दूँ
हवाओं के चादर से,आशियाना बना दूँ
रिमझिम फुहारों की शीतलता मे आज
हुस्न को जो देख ले दीवाना बना दूँ
रुबाइयों मे रहे जो रहमतों की बारिश
साहित्य को सौंदर्य का मुहाना बना दूँ
गजल बह्र मे कहने की है बात अच्छी
भावों मे कहने का भी ठिकाना बना दूँ
रुख पर तिल, रुखसार कातिल सी लगे
अदाओं से जन्नत को निभाना बना दूँ
महत्व का प्रसाद सत्व का साहित्य रहे
अनर्गल प्रवाह को अब निशाना बना दूँ
बचपन के अलिखित अबूझ गुंजन को
पिरो चंचलता की चुहल सुहाना बना दूँ
जातिगत संघर्षों मे मित्र अब विराम कहाँ
दास्तान है संघर्षों का, आराम कहाँ
डूबता रहा,शताब्दियों मे, शाम कहाँ
निर्वाह कब तक, कसक की अन्त्येष्टि
रक्त धमनियों मे जाम है, नाम कहाँ
रिक्तता समृद्धि है,अंतस का आर्तनांद सुन
सार्थकता शोकाकुल,खुशियों का पैगाम कहाँ
हरीतिमा का हस्तांतरण, कंक्रीट मे पैवस्त
रासायनिक रक्त, शुक्राणुओं का धाम कहाँ
ईर्ष्या का एश्वर्य और वासना का मधुमास
जातिगत संघर्षों मे मित्र अब विराम कहाँ
गुनेश्वर
मुफ़लिसी मे जी रही अब ये बस्तियाँ
मुफ़लिसी मे जी रही अब ये बस्तियाँ
कर्ज पानी की तरह पी रही हस्तियाँ
पसलियों से चिपकी नग्न सिसकियाँ
छत से लटकती हैं रोज-रोज रस्सियाँ
नहीं है अब ज़िंदगी मे कोई मस्तियाँ
रेत पर कहाँ चला करती हैं कश्तीयाँ
नस्ल और नकसलवाद की गोलियाँ
खेल रहीं हैं सरेआम खूनी होलियाँ
मौत की लग रही आजकल बोलियाँ
उद्यमी वर्दहस्त और उनकी खोलियाँ
नित्य नई अबूझ घोषित ये नीतियाँ
क्रियान्वयन की रिक्तता और वीथियाँ
गुनेश्वर
दुख मे सुमिरन तुम करो
दुख मे सुमिरन तुम करो
सुख के लिए कहो राधे राधे
मेहनत का फल मीठा होगा
चाहे मिले वो फल आधे आधे
तरुवर की छाया मिलेगी ही
मन साधो और कहो राधे राधे
जग तुम्हारा है तुम हो स्वामी
सत्व का सुख होगा मन जो साधे
गुनेश्वर
कभी निखर जाना मेरी याद मे
कभी निखर जाना मेरी याद मे
खुद ही चली आना मेरी याद मे
बैठा मिलुंगा मैं एक शब्द लिए
छुना और शरमाना मेरी याद मे
छुकर हौले से गुजर जाएंगी हवा
तन्हा दुपट्टा गिराना मेरी याद मे
नम आँखों मे सर्द हथेलियाँ रख
नया एहसास पाना मेरी याद मे
नजर का टीका जो लगे गालों पर
आज फिर सँवर जाना मेरी याद मे
मुद्दतों गुजरी है खिलखिलाए हुए
हँसी की बारिश सजाना मेरी याद मे
कैद तुम भी हो और कैद मैं भी
तस्वीर से निभाना मेरी याद मे
गुनेश्वर
मेरे घर के आईने मे
मेरे घर के आईने मे
मैं दर्दों गम समेट लूँ
चाहता मैं तुझको रहूँ,
खुदा से आज भेंट लूँ
मेरी ज़िंदगी मे मैं रहूँ
तुझे प्रेम मे लपेट लूँ
गुनेश्वर
भाँति भाँति के लोग पधारे, जीवन होता जाता मृदंग
अनुज पधारे चितचोर मुकुट धारे भाई भावज के संग
कलरव करती मृगनयनी, सुन सखा के प्रेंमातुर प्रसंग
झरने कल-कल बहते,चहकते पक्षी, देख हो जाते दंग
रंगबिरंगी तितलियाँ उड़ती मधुबन मे बाला के संग
देखो देखो, सुनो सुनो कैसे है बाजे आज जलतरंग
हरीतिमा तो है खूब लहराती, जैसे बलखाती नदिया
सौंधी सौंधी खुशबू आती और सब होते जाते मलंग
संकरा होता जाता गलियों का विस्तार और मन तंग
दिव्य स्वप्न टूटा कैसे, हे मित्र, मन मे है भरपूर जंग
गुनेश्वर
तुम डिबरूगढ़ की शहजादी
तुम डिबरूगढ़ की शहजादी
मैं कुम्भ मे बिछुड़ा आवारा
तुम पानी की लगती फुहारें
मैं समन्दर का झाग खारा
तुम हो चन्दन की खुशबू
मैं मुनिसपालिटी का बेचारा
तुम वीणा की झंकृत वाणी
मैं झींगुरों सा कीर्तन प्यारा
तुम हो गंगा की नैसर्गिक्ता
मैं उथला नलकूप हूँ हारा
तुम लगती गीता की सौगंध
मैं अपनी कविता मे बंजारा
तुम शीतल शब्दों की गरीमा
पर मित्र मुझे पुकारे दोबारा
गुनेश्वर
लिख कर नाम मिटाना उसकी आदत है
लिख कर नाम मिटाना उसकी आदत है
वो कातिल मुहब्बत से शर्मिंदा करती है
रोज हमसे ही काम का गुहार करती है
पर हमेशा वो सरे बाजार निंदा करती है
हाँथ थामा तो समझा तकदीर खुल गयी
जो मिली, रुला रुला के जिंदा करती है
एशों आराम सारे दिये जी भर भर के
पलंग तोड़ती, पूरा जीवन गंदा करती है
शाली से जरा क्या हँस बोल लिए कभी
मुहल्ले-मे सब के सामने पंगा करती है
बड़ी गुस्सेल है वो नकचढ़ी छप्पन छुरी
बेरहमी से मार मार के चंगा करती है
कासे कहें, कैसे कहें दुख भरी बातें मित्र
बात-बे-बात न जाने क्यों दंगा करती है
गुनेश्वर
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