विविध भाव
Wednesday, 24 July 2013
रो रो कर तो उसका बहुत बुरा हाल हो गया
सब कहते हैं शर्म से चेहरा लाल हो गया
आने का कह गए पिया,नही आ पाये सीमा से
खबर भी नहीं,न पत्र ही,ये कैसा हाल हो गया
आस लिए खुशी से रात भर न सोती थी बेचारी
रक्षक, न आए अबतलक,और दस साल हो गया
हम सब घरों मे अपने खुशियों मे मशगूल हैं
उसकी उन आँखों मे रो-रो कर जाल हो गया
अब तो कोई बता दे खाविंद जिंदा है या मुर्दा
सुख कर तो जिस्म उसका खाल हो गया
रफ्ता रफ्ता कट जाएगी यह ज़िंदगी भी उसकी
व्यवस्था देश की उसके लिए गर्तो-गाल हो गया
जो पता चला जिंदा है, अब तक खाविंद पड़ोस मे
द्वारे खड़ी राह तकते उसका इंतकाल हो गया
नेह की धरा में आज सपनों के घरौंदे हैं
इन्हें चाहने वाले भी तो कितने सौंधे हैं
मिट्टी हाँथों मे लेकर मैं मंत्र पुष्प पढ़ता हूँ
आस्था तो चरमौतकर्ष,मगर मनन औंधें हैं|||
किण्वन की हमको नहीं आती प्रक्रिया समझो
हमने भी लगाए धरा पर कितने पौधें हैं|||
जिज्ञासुल है अब अंतस की संकीर्णता
जाने क्यूँ इस तरह के विचार कौंधे हैं|||
क्या ही ! खूब श्रिंगारित है, धरणी का सौंदर्य
पर बेदर्दी से, धरा को अपने, क्यों?रौंदें हैं|||
झूठ को जो बालिस्त भर जमी भी दे दोगे तुम
सौन्दर्य सच का वजूद कुरेदेगा चौखट पर
ज़िंदगी यूं ही चलता जा रहा है
मन तो बस जलता ही जा रहा है
मौन हो गई एहसासों की गर्मी
सूरज भी अब ढलता ही जा रहा है
शब्द कभी अमृत सा लगता था
जाने क्यूँ खलता ही जा रहा है
क्रोध इतना बढ़ गया मन का
आग मे पिघलता ही जा रहा है
मुहब्बत अंजुरी भर भर थी कभी
अब बस हाँथ मलता ही जा रह है
वो बच्चा पैदा हुआ सड़कों पर
बेहिचक वहीं पलता ही जा रहा है
मक्कारों की इस भरी दुनिया मे
देह से देह मसलता ही जा रहा है
मैं उनके मुकाम तक जब आ जाऊँगा
वाह-वाह का दामन मैं भी निभा जाऊँगा
न कोई बैर न छल कपट मेरा उनसे
मेहनत मे हूँ,इक सीढ़ी तो पा जाऊँगा
वो मुझसे टूट के मिलते हैं हमेशा
उनके गजलों का दिया सजा जाऊँगा
लोग गुबार निकालते हैं गाहे बगाहे
वक्त आयेगा मैं सब को जता जाऊँगा
टूटता है हर बार सरगोशीयों के जहर से
सोचता है अब इश्क का राज बता जाऊँगा
शहर की गलियाँ अनजान रहने लगी है
आजकल वो बहुत परेशान रहने लगी हैं
बेरिकेट के साये मे जीती है ज़िंदगी
बटालियन को देख हैरान रहने लगी है
छिन गई है आजादी चप्पे चप्पे की
संकरी गली भी वीरान रहने लगी है
दर्द भी सुख चुका खुरचने की इंतेहा है
ज़िंदगी अब खुद मेहमान रहने लगी है
दर्द की कसीदाकारी मे है वो मादरजाद
चीख पुकार जैसे वरदान रहने लगी है
गुनेश्वर
गफलत की चाँदनी मे आज नहा तू लूँ
शौक को मेज के नीचे से मँगवा तो लूँ
ठेका ठूक गया है सामाजिक चेतना का
पेनशनी बूढ़े से अंटी मे कुछ डलाव तो लूँ
मुलाज़िम हूँ सरकारी, सत्ता जैसा ही हूँ
किसानो की भी मैं धोती उतरवा तो लूँ
घुसपेठिये सीमा पार से आतें हैं आने दो
वोट-बैंक है वो, नकली कार्ड छपवा तो लूँ
चाटुकारी की सत्ता है, साथ चुना-कत्था है
जो बचा है उसमे भी मैं चुना लगवा तो लूँ
गुनेश्वर
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